गोस्वामी तुलसीदासजी
दशरथ-कैकेयी संवाद और दशरथ शोक, सुमन्त्र का महल में जाना और वहाँ से लौटकर
श्री रामजी को महल में भेजना
छन्द :
* केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।
मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥
दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।
तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥
मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥
दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।
तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥
भावार्थ:-'हे रानी! किसलिए रूठी हो?' यह
कहकर राजा उसे हाथ से स्पर्श करते हैं, तो वह उनके हाथ को
(झटककर) हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोध में भरी हुई नागिन क्रूर
दृष्टि से देख रही हो। दोनों (वरदानों की) वासनाएँ उस नागिन की दो जीभें
हैं और दोनों वरदान दाँत हैं, वह काटने के लिए मर्मस्थान देख रही है। तुलसीदासजी
कहते हैं कि राजा दशरथ होनहार के वश में होकर इसे (इस प्रकार हाथ
झटकने और नागिन की भाँति देखने को) कामदेव की क्रीड़ा ही समझ
रहे हैं।
सोरठा :
* बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि।
कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥25॥
कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥25॥
भावार्थ:-राजा बार-बार
कह रहे हैं- हे सुमुखी! हे सुलोचनी! हे कोकिलबयनी! हे गजगामिनी! मुझे अपने क्रोध का कारण तो सुना॥25॥
चौपाई :
* अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥
कहु केहि रंकहि करौं नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥1॥
कहु केहि रंकहि करौं नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥1॥
भावार्थ:-हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं? यमराज
किसको लेना (अपने लोक को
ले जाना) चाहते हैं? कह, किस
कंगाल को राजा कर दूँ या किस राजा को देश से निकाल
दूँ?॥1॥
* सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥
जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥2॥
जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥2॥
भावार्थ:-तेरा शत्रु अमर (देवता) भी
हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूँ। बेचारे कीड़े-मकोड़े सरीखे नर-नारी
तो चीज ही क्या हैं। हे सुंदरी! तू तो मेरा स्वभाव जानती ही
है कि मेरा मन सदा तेरे मुख रूपी चन्द्रमा का चकोर है॥2॥
* प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥
जौं कछु कहौं कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥3॥
जौं कछु कहौं कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥3॥
भावार्थ:-हे प्रिये! मेरी प्रजा, कुटम्बी, सर्वस्व (सम्पत्ति),
पुत्र, यहाँ तक कि मेरे प्राण भी, ये
सब तेरे वश में (अधीन) हैं। यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊँ तो
हे भामिनी! मुझे सौ बार राम की सौगंध है॥3॥
* बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥।
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥4॥
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥4॥
भावार्थ:-तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी
मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगों को आभूषणों से
सजा। मौका-बेमौका तो मन में विचार कर देख। हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेष
को त्याग दे॥4॥
दोहा :
* यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।
भूषन सजति बिलोकिमृगु मनहुँ किरातिनि फंद॥26॥
भूषन सजति बिलोकिमृगु मनहुँ किरातिनि फंद॥26॥
भावार्थ:-यह सुनकर और मन में
रामजी की बड़ी सौंगंध को विचारकर मंदबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने
पहनने लगी, मानो कोई भीलनी मृग को देखकर फंदा तैयार कर रही हो!॥26॥
चौपाई :
* पुनि कह राउ सुहृद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥
भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥1॥
भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥1॥
भावार्थ:-अपने जी में कैकेयी
को सुहृद् जानकर राजा दशरथजी प्रेम से पुलकित होकर कोमल और सुंदर वाणी
से फिर बोले- हे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया। नगर में घर-घर आनंद के बधावे
बज रहे हैं॥1॥
* रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥
दलकि उठेउ सुनि हृदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥2॥
दलकि उठेउ सुनि हृदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥2॥
भावार्थ:-मैं कल ही राम को
युवराज पद दे रहा हूँ, इसलिए हे सुनयनी! तू मंगल साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने
लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो॥2॥
* ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥
लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥3॥
लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥3॥
भावार्थ:-ऐसी भारी पीड़ा को
भी उसने हँसकर छिपा लिया,
जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें
उसका भेद न खुल जाए)। राजा उसकी कपट-चतुराई को नहीं लख रहे हैं, क्योंकि वह करोड़ों कुटिलों की शिरोमणि
गुरु मंथरा की पढ़ाई हुई है॥3॥
* जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥
कपट सनेहु बढ़ाई बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥4॥
कपट सनेहु बढ़ाई बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥4॥
भावार्थ:-यद्यपि राजा नीति
में निपुण हैं, परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम
बढ़ाकर (ऊपर से प्रेम दिखाकर)
नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली-॥4॥
दोहा :
* मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥27॥
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥27॥
भावार्थ:-हे प्रियतम! आप माँग-माँग
तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो वरदान देने
को कहा था, उनके भी मिलने में संदेह है॥27॥
चौपाई :
* जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई॥
थाती राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥1॥
थाती राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥1॥
भावार्थ:-राजा ने हँसकर कहा
कि अब मैं तुम्हारा मर्म (मतलब) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने
उन वरों को थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलने का
स्वभाव होने से मुझे भी वह प्रसंग याद नहीं रहा॥1॥
* झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ परु बचनु न जाई॥2॥
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ परु बचनु न जाई॥2॥
भावार्थ:-मुझे झूठ-मूठ दोष
मत दो। चाहे दो के बदले चार माँग लो। रघुकुल में सदा से यह रीति चली आई है
कि प्राण भले ही चले जाएँ,
पर वचन नहीं जाता॥2॥
* नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥3॥
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥3॥
भावार्थ:-असत्य के समान पापों
का समूह भी नहीं है। क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़ के समान
हो सकती हैं। 'सत्य' ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों) की जड़ है। यह बात वेद-पुराणों में प्रसिद्ध है और मनुजी ने भी
यही कहा है॥3॥
* तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई॥
बाद दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥4॥
बाद दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥4॥
भावार्थ:-उस पर मेरे द्वारा
श्री रामजी की शपथ करने में आ गई (मुँह से निकल पड़ी)।
श्री रघुनाथजी मेरे सुकृत (पुण्य) और स्नेह की सीमा हैं। इस प्रकार बात पक्की कराके
दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो उसने कुमत (बुरे
विचार) रूपी दुष्ट पक्षी (बाज)
(को छोड़ने के लिए उस) की कुलही (आँखों
पर की टोपी) खोल दी॥4॥
दोहा :
* भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।
भिल्लिनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥28॥
भिल्लिनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥28॥
भावार्थ:-राजा का मनोरथ सुंदर
वन है, सुख सुंदर पक्षियों का समुदाय है। उस पर भीलनी की तरह कैकेयी अपना
वचन रूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है॥28॥
मासपारायण, तेरहवाँ विश्राम
मासपारायण, तेरहवाँ विश्राम
चौपाई :
* सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥1॥
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥1॥
भावार्थ:-(वह बोली-)
हे प्राण
प्यारे! सुनिए, मेरे मन को भाने वाला एक वर तो दीजिए, भरत को राजतिलक और
हे नाथ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिए-॥1॥
* तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥2॥
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥2॥
भावार्थ:-तपस्वियों के वेष
में विशेष उदासीन भाव से (राज्य और कुटुम्ब आदि की ओर से भलीभाँति उदासीन
होकर विरक्त मुनियों की भाँति) राम चौदह वर्ष तक वन में
निवास करें। कैकेयी के कोमल (विनययुक्त) वचन सुनकर राजा के हृदय में ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमा
की किरणों के स्पर्श से चकवा विकल हो जाता है॥2॥
* गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥
बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥3॥
बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥3॥
भावार्थ:-राजा सहम गए, उनसे
कुछ कहते न बना मानो बाज वन में बटेर पर झपटा हो। राजा का रंग बिलकुल उड़
गया, मानो ताड़ के पेड़ को बिजली ने मारा हो (जैसे ताड़ के पेड़ पर बिजली
गिरने से वह झुलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजा का हुआ)॥3॥
* माथें हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥
मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥4॥
मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥4॥
भावार्थ:-माथे पर हाथ रखकर, दोनों
नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात् सोच ही शरीर
धारण कर सोच कर रहा हो। (वे सोचते हैं- हाय!)
मेरा मनोरथ रूपी कल्पवृक्ष
फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयी ने हथिनी की तरह उसे जड़ समेत
उखाड़कर नष्ट कर डाला॥4॥
* अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हिसि अचल बिपति कै नेईं॥5॥
भावार्थ:-कैकेयी ने अयोध्या को उजाड़
कर दिया और विपत्ति की अचल (सुदृढ़) नींव डाल दी॥5॥
दोहा :
* कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥29॥
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥29॥
भावार्थ:-किस अवसर पर क्या
हो गया! स्त्री का विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे
योग की सिद्धि रूपी फल मिलने के समय योगी को अविद्या नष्ट कर देती है॥29॥
चौपाई :
* एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा॥
भरतु कि राउर पूत न होंही। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥1॥
भरतु कि राउर पूत न होंही। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥1॥
भावार्थ:-इस प्रकार राजा मन
ही मन झींख रहे हैं। राजा का ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मन में
बुरी तरह से क्रोधित हुई। (और बोली-)
क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं? क्या
मुझे आप दाम देकर खरीद लाए हैं? (क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ?)॥1॥
* जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारें॥
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥2॥
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥2॥
भावार्थ:-जो मेरा वचन सुनते
ही आपको बाण सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिए- हाँ
कीजिए, नहीं तो नाहीं कर दीजिए। आप रघुवंश में सत्य प्रतिज्ञा वाले
(प्रसिद्ध) हैं!॥2॥
* देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥
सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥3॥
सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥3॥
भावार्थ:-आपने ही वर देने
को कहा था, अब भले ही न दीजिए। सत्य को छोड़ दीजिए और जगत में अपयश लीजिए।
सत्य की बड़ी सराहना करके वर देने को कहा था। समझा था कि यह चबेना ही
माँग लेगी!॥3॥
* सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥
अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥4॥
अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥4॥
भावार्थ:-राजा शिबि, दधीचि
और बलि ने जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचन की प्रतिज्ञा
को निबाहा। कैकेयी बहुत ही कड़ुवे वचन कह रही है, मानो
जले पर नमक छिड़क रही हो॥4॥
दोहा :
* धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥30॥
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥30॥
भावार्थ:-धर्म की धुरी को
धारण करने वाले राजा दशरथ ने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी
साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा (ऐसी कठिन परिस्थिति
उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया)॥30॥
चौपाई :
* आगें दीखि जरत सिर भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥1॥
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥1॥
भावार्थ:-प्रचंड क्रोध से
जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखाई पड़ी, मानो क्रोध रूपी तलवार नंगी
(म्यान से बाहर) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवार की मूठ है, निष्ठुरता धार है
और वह कुबरी (मंथरा) रूपी सान पर धरकर तेज की हुई है॥1॥
* लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥
बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥2॥
बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥2॥
भावार्थ:-राजा ने देखा कि
यह (तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है (और सोचा-) क्या सत्य ही यह मेरा जीवन
लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रता के साथ उसे (कैकेयी को) प्रिय
लगने वाली वाणी बोले-॥2॥
* प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरु साखी॥3॥
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरु साखी॥3॥
भावार्थ:-हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास
और प्रेम को नष्ट करके ऐसे बुरी तरह के वचन कैसे कह रही हो। मेरे
तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें (अर्थात एक से) हैं, यह
मैं शंकरजी की साक्षी देकर सत्य कहता हूँ॥3॥
* अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥4॥
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥4॥
भावार्थ:-मैं अवश्य सबेरे
ही दूत भेजूँगा। दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) सुनते ही तुरंत आ जाएँगे। अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधवाकर, सब
तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरत को राज्य दे दूँगा॥4॥
दोहा :
* लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति॥31॥
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति॥31॥
भावार्थ:-राम को राज्य का
लोभ नहीं है और भरत पर उनका बड़ा ही प्रेम है। मैं ही अपने मन में बड़े-छोटे
का विचार करके राजनीति का पालन कर रहा था (बड़े को राजतिलक देने जा
रहा था)॥31॥
चौपाई :
* राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ॥
मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥1॥
मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥1॥
भावार्थ:-राम की सौ बार सौगंध
खाकर मैं स्वभाव से ही कहता हूँ कि राम की माता (कौसल्या) ने (इस विषय
में) मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया।
इसी से मेरा मनोरथ खाली गया॥1॥
* रिस परिहरु अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू॥
एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥2॥
एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥2॥
भावार्थ:-अब क्रोध छोड़ दे
और मंगल साज सज। कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जाएँगे। एक ही बात का मुझे
दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चन का माँगा॥2॥
* अजहूँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा॥
कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥3॥
कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥3॥
भावार्थ:-उसकी आँच से अब भी
मेरा हृदय जल रहा है। यह दिल्लगी में, क्रोध में अथवा सचमुच ही (वास्तव में) सच्चा
है? क्रोध को त्यागकर राम का अपराध तो बता। सब कोई तो कहते हैं कि
राम बड़े ही साधु हैं॥3॥
* तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥
जासु सुभाउ अरिहि अनूकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥4॥
जासु सुभाउ अरिहि अनूकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥4॥
भावार्थ:-तू स्वयं भी राम
की सराहना करती और उन पर स्नेह किया करती थी। अब यह सुनकर मुझे संदेह हो
गया है (कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे?) जिसका
स्वभाव शत्रु को भी अनूकल है,
वह माता के प्रतिकूल आचरण क्यों कर करेगा?॥4॥
दोहा :
* प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।
जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥32॥
जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥32॥
भावार्थ:-हे प्रिये! हँसी
और क्रोध छोड़ दे और विवेक (उचित-अनुचित) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरत का राज्याभिषेक देख सकूँ॥32॥
चौपाई :
* जिऐ मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥1॥
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥1॥
भावार्थ:-मछली चाहे बिना पानी
के जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणि के दीन-दुःखी होकर जीता रहे, परन्तु
मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, मन में (जरा भी) छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन
राम के बिना नहीं है॥1॥
* समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना॥
सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥2॥
सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥2॥
भावार्थ:-हे चतुर प्रिये! जी
में समझ देख, मेरा जीवन श्री राम के दर्शन के अधीन है। राजा के कोमल
वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है। मानो अग्नि में घी की आहुतियाँ
पड़ रही हैं॥2॥
* कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया॥
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥3॥
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥3॥
भावार्थ:-(कैकेयी कहती
है-) आप करोड़ों उपाय क्यों न
करें, यहाँ आपकी माया (चालबाजी) नहीं लगेगी।
या तो मैंने जो माँगा है सो दीजिए, नहीं
तो 'नाहीं' करके अपयश लीजिए। मुझे बहुत प्रपंच (बखेड़े) नहीं सुहाते॥3॥
* रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने॥
जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥4॥
जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥4॥
भावार्थ:-राम साधु हैं, आप
सयाने साधु हैं और राम की माता भी भली है, मैंने सबको पहचान लिया है। कौसल्या
ने मेरा जैसा भला चाहा है,
मैं भी साका करके (याद रखने योग्य) उन्हें वैसा ही फल दूँगी॥4॥
दोहा :
* होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥33॥
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥33॥
भावार्थ:-(सबेरा होते ही मुनि का वेष धारण कर यदि राम वन को नहीं
जाते, तो हे राजन्! मन में (निश्चय) समझ लीजिए कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश!॥33॥
चौपाई :
* अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥
पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥1॥
पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥1॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी
उठ खड़ी हुई, मानो क्रोध की नदी उमड़ी हो। वह नदी पाप रूपी पहाड़ से
प्रकट हुई है और क्रोध रूपी जल से भरी है, (ऐसी भयानक है कि) देखी
नहीं जाती!॥1॥
* दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥
ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनूकूला॥2॥
ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनूकूला॥2॥
भावार्थ:-दोनों वरदान उस नदी
के दो किनारे हैं, कैकेयी का कठिन हठ ही उसकी (तीव्र) धारा है और कुबरी
(मंथरा) के वचनों की प्रेरणा ही भँवर है। (वह क्रोध रूपी नदी) राजा दशरथ
रूपी वृक्ष को जड़-मूल से ढहाती हुई विपत्ति रूपी समुद्र की ओर (सीधी) चली है॥2॥
* लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥
गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥3॥
गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥3॥
भावार्थ:-राजा ने समझ लिया
कि बात सचमुच (वास्तव में) सच्ची है, स्त्री के बहाने मेरी मृत्यु ही सिर पर नाच रही है। (तदनन्तर
राजा ने कैकेयी के) चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल (रूपी
वृक्ष) के लिए कुल्हाड़ी मत बन॥3॥
* मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥
राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥4॥
राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥4॥
भावार्थ:-तू मेरा मस्तक माँग
ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर राम के विरह में मुझे मत मार। जिस किसी प्रकार
से हो तू राम को रख ले। नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी॥4॥
दोहा :
* देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।
कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥34॥
कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥34॥
भावार्थ:-राजा ने देखा कि रोग असाध्य
है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणी से 'हा राम! हा राम! हा
रघुनाथ!'
कहते हुए सिर पीटकर जमीन पर गिर पड़े॥34॥
चौपाई :
* ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥
कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥1॥
कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥1॥
भावार्थ:-राजा व्याकुल हो
गए, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनी ने कल्पवृक्ष को उखाड़ फेंका
हो। कंठ सूख गया, मुख से बात नहीं निकलती, मानो पानी के बिना पहिना नामक
मछली तड़प रही हो॥1॥
* पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥2॥
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥2॥
भावार्थ:-कैकेयी फिर कड़वे
और कठोर वचन बोली, मानो घाव में जहर भर रही हो। (कहती है-) जो अंत में
ऐसा ही करना था, तो आपने 'माँग, माँग' किस बल पर कहा था?॥2॥
* दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥
दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥3॥
दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥3॥
भावार्थ:-हे राजा! ठहाका मारकर
हँसना और गाल फुलाना- क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना
और कंजूसी भी करना। क्या रजपूती में क्षेम-कुशल भी रह सकती है?(लड़ाई में
बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे!)॥3॥
* छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥4॥
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥4॥
भावार्थ:-या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही
छोड़ दीजिए या धैर्य धारण कीजिए। यों असहाय स्त्री की भाँति रोइए-पीटिए
नहीं। सत्यव्रती के लिए तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन
और पृथ्वी- सब तिनके के बराबर कहे गए हैं॥4॥
दोहा :
* मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।
लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥35॥
लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥35॥
भावार्थ:-कैकेयी के मर्मभेदी
वचन सुनकर राजा ने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है।
मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है॥35॥
चौपाई :
* चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें॥
सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥
सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥
भावार्थ:-भरत तो भूलकर भी
राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जी में कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापों
का परिणाम है, जिससे कुसमय (बेमौके) में विधाता विपरीत हो गया॥1॥
* सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई॥
करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥2॥
करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥2॥
भावार्थ:- (तेरी उजाड़ी हुई) यह सुंदर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणों के धाम
श्री राम की प्रभुता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकों में
श्री राम की बड़ाई होगी॥2॥
* तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ॥
अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई॥3॥
अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई॥3॥
भावार्थ:-केवल तेरा कलंक और
मेरा पछतावा मरने पर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जाएगा। अब तुझे जो
अच्छा लगे वही कर। मुँह छिपाकर मेरी आँखों की ओट जा बैठ (अर्थात मेरे सामने
से हट जा, मुझे मुँह न दिखा)॥3॥
* जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी॥
फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी॥4॥
फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी॥4॥
भावार्थ:-मैं हाथ जोड़कर कहता
हूँ कि जब तक मैं जीता रहूँ, तब तक फिर कुछ न कहना (अर्थात
मुझसे न बोलना)। अरी अभागिनी! फिर तू अन्त में पछताएगी जो तू नहारू (ताँत) के लिए गाय
को मार रही है॥4॥
दोहा :
* परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।
कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु॥36॥
कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु॥36॥
भावार्थ:-राजा करोड़ों प्रकार
से (बहुत तरह से) समझाकर (और यह कहकर) कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वी
पर गिर पड़े। पर कपट करने में चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो (मौन
होकर) मसान जगा रही हो (श्मशान में बैठकर प्रेतमंत्र सिद्ध कर रही हो)॥36॥
चौपाई :
* राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई॥1॥
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई॥1॥
भावार्थ:-राजा 'राम-राम' रट
रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंख के बिना बेहाल हो।
वे अपने हृदय में मनाते हैं कि सबेरा न हो और कोई जाकर श्री रामचन्द्रजी से यह बात
न कहे॥1॥
* उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥
भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥2॥
भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥2॥
भावार्थ:-हे रघुकुल के गुरु
(बड़ेरे, मूलपुरुष) सूर्य भगवान्! आप अपना उदय न करें। अयोध्या को (बेहाल) देखकर आपके हृदय में बड़ी
पीड़ा होगी। राजा की प्रीति और कैकेयी की निष्ठुरता
दोनों को ब्रह्मा ने सीमा तक रचकर बनाया है (अर्थात राजा प्रेम की
सीमा है और कैकेयी निष्ठुरता की)॥2॥
* बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥3॥
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥3॥
भावार्थ:-विलाप करते-करते
ही राजा को सबेरा हो गया!
राज द्वार पर वीणा, बाँसुरी
और शंख की ध्वनि होने लगी। भाट लोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणों का गान कर रहे
हैं। सुनने पर राजा को वे बाण जैसे लगते हैं॥3॥
* मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥
तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥4॥
तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥4॥
भावार्थ:-राजा को ये सब मंगल
साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पति के साथ सती होने वाली स्त्री
को आभूषण! श्री रामचन्द्रजी के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण उस रात्रि में
किसी को भी नींद नहीं आई॥4॥
दोहा :
* द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि॥37॥
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि॥37॥
भावार्थ:-राजद्वार पर मंत्रियों
और सेवकों की भीड़ लगी है। वे सब सूर्य को उदय हुआ देखकर कहते हैं
कि ऐसा कौन सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभी तक नहीं जागे?॥37॥
चौपाई :
* पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥1॥
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥1॥
भावार्थ:-राजा नित्य ही रात
के पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है।
हे सुमंत्र! जाओ, जाकर राजा को जगाओ। उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें॥1॥
* गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं॥
धाइ खाई जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥2॥
धाइ खाई जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥2॥
भावार्थ:-तब सुमंत्र रावले
(राजमहल) में गए, पर महल को भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं। (ऐसा
लगता है) मानो दौड़कर काट खाएगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता। मानो विपत्ति
और विषाद ने वहाँ डेरा डाल रखा हो॥2॥
* पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥3॥
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥3॥
भावार्थ:-पूछने पर कोई जवाब
नहीं देता। वे उस महल में गए, जहाँ राजा और कैकेयी थे 'जय
जीव' कहकर सिर नवाकर (वंदना करके) बैठे और राजा की दशा देखकर तो वे सूख ही गए॥3॥
* सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहु कमल मूलु परिहरेऊ॥
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूँछी॥4॥
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूँछी॥4॥
भावार्थ:-(देखा कि-) राजा सोच से व्याकुल हैं, चेहरे
का रंग उड़ गया है। जमीन पर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़
से उखड़कर)
(मुर्झाया) पड़ा हो। मंत्री मारे डर के
कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभ से भरी हुई और शुभ से विहीन कैकेयी बोली-॥4॥
दोहा :
* परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।
रामु रामु रटि भोरु किय कहइ ना मरमु महीसु॥38॥
रामु रामु रटि भोरु किय कहइ ना मरमु महीसु॥38॥
भावार्थ:-राजा को रातभर नींद
नहीं आई, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें। इन्होंने 'राम राम' रटकर
सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते॥38॥
चौपाई :
* आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥
चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥1॥
चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥1॥
भावार्थ:-तुम जल्दी राम को बुला लाओ।
तब आकर समाचार पूछना। राजा का रुख जानकर सुमंत्रजी चले, समझ
गए कि रानी ने कुछ कुचाल की है॥1॥
* सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥
उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछहिं सकल देखि मनु मारें॥2॥
उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछहिं सकल देखि मनु मारें॥2॥
भावार्थ:-सुमंत्र सोच से व्याकुल
हैं, रास्ते पर पैर नहीं पड़ता (आगे बढ़ा नहीं जाता), (सोचते हैं-)
रामजी को बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी
तरह हृदय में धीरज धरकर वे द्वार पर गए। सब लोग उनको मन मारे (उदास) देखकर
पूछने लगे॥2॥
* समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥
राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥3॥
राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥3॥
भावार्थ:-सब लोगों का समाधान
करके (किसी तरह समझा-बुझाकर) सुमंत्र वहाँ गए, जहाँ सूर्यकुल के तिलक श्री रामचन्द्रजी थे। श्री रामचन्द्रजी
ने सुमंत्र को आते देखा तो पिता के समान समझकर उनका आदर किया॥3॥
* निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥
रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥4॥
रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥4॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी
के मुख को देखकर और राजा की आज्ञा सुनाकर वे रघुकुल के दीपक श्री
रामचन्द्रजी को (अपने साथ) लिवा चले। श्री रामचन्द्रजी मंत्री के साथ बुरी
तरह से (बिना किसी लवाजमे के)
जा रहे हैं, यह
देखकर लोग जहाँ-तहाँ विषाद कर रहे हैं॥4॥
दोहा :
* जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।
सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु॥39॥
सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु॥39॥
भावार्थ:-रघुवंशमणि श्री रामचन्द्रजी
ने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालत में पड़े हैं, मानो
सिंहनी को देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो॥39॥
चौपाई :
* सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू॥
सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई॥1॥
सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई॥1॥
भावार्थ:-राजा के होठ सूख
रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणि के बिना साँप दुःखी हो रहा हो।
पास ही क्रोध से भरी कैकेयी को देखा, मानो (साक्षात) मृत्यु ही बैठी (राजा
के जीवन की अंतिम) घड़ियाँ गिन रही हो॥1॥
री राम-कैकेयी संवाद
* करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ॥
तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥2॥
तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥2॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी
का स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने (अपने जीवन में) पहली बार
यह दुःख देखा, इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। तो भी समय का विचार
करके हृदय में धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनों से माता कैकेयी से पूछा-॥2॥
* मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन॥
सुनहु राम सबु कारनु एहू। राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू॥3॥
सुनहु राम सबु कारनु एहू। राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू॥3॥
भावार्थ:-हे माता! मुझे पिताजी
के दुःख का कारण कहो, ताकि उसका निवारण हो (दुःख दूर हो) वह यत्न किया जाए। (कैकेयी ने कहा-)
हे राम! सुनो, सारा
कारण यही है कि राजा का तुम पर बहुत स्नेह है॥3॥
* देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना॥
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥4॥
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥4॥
भावार्थ:-इन्होंने मुझे दो
वरदान देने को कहा था। मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वही
मैंने माँगा। उसे
सुनकर राजा के हृदय में सोच हो गया, क्योंकि
ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते॥4॥
दोहा :
* सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।
सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु॥40॥
सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु॥40॥
भावार्थ:-इधर तो पुत्र का
स्नेह है और उधर वचन (प्रतिज्ञा),
राजा इसी धर्मसंकट में पड़ गए हैं। यदि तुम
कर सकते हो, तो राजा की आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेश को मिटाओ॥40॥
चौपाई :
* निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी॥
जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना॥1॥
जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना॥1॥
भावार्थ:-कैकेयी बेधड़क बैठी
ऐसी कड़वी वाणी कह रही है,
जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो
उठी। जीभ धनुष है, वचन बहुत से तीर हैं और मानो राजा ही कोमल निशाने के समान
हैं॥1॥
* जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू॥
सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई॥2॥
सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई॥2॥
भावार्थ:-(इस सारे साज-समान के साथ) मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीर का शरीर धारण करके धनुष विद्या
सीख रहा है। श्री रघुनाथजी को सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता
ही शरीर धारण किए हुए हो॥2॥
* मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू॥
बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥3॥
बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥3॥
भावार्थ:-सूर्यकुल के सूर्य, स्वाभाविक
ही आनंदनिधान श्री रामचन्द्रजी मन में मुस्कुराकर सब दूषणों
से रहित ऐसे कोमल और सुंदर वचन बोले जो मानो वाणी के भूषण ही थे-॥3॥
* सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥4॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥4॥
भावार्थ:-हे माता! सुनो, वही
पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माता के वचनों का अनुरागी (पालन करने वाला) है। (आज्ञा पालन द्वारा)
माता-पिता को संतुष्ट करने वाला पुत्र, हे
जननी! सारे संसार में दुर्लभ है॥4॥
दोहा :
* मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥41॥
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥41॥
भावार्थ:-वन में विशेष रूप
से मुनियों का मिलाप होगा,
जिसमें मेरा सभी प्रकार से कल्याण है। उसमें भी, फिर
पिताजी की आज्ञा और हे जननी!
तुम्हारी सम्मति है,॥41॥
चौपाई :
* भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू॥
जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥1॥
जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥1॥
भावार्थ:-और प्राण प्रिय भरत
राज्य पावेंगे। (इन सभी बातों को देखकर यह प्रतीत होता है कि) आज विधाता
सब प्रकार से मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं)।
यदि ऐसे काम के
लिए भी मैं वन को न जाऊँ तो मूर्खों के समाज
में सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिए॥1॥
* सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी॥
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं॥2॥
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं॥2॥
भावार्थ:-जो कल्पवृक्ष को
छोड़कर रेंड की सेवा करते हैं और अमृत त्याग कर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम
मन में विचार कर देखो, वे (महामूर्ख) भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे॥2॥
* अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी॥
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी॥3॥
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी॥3॥
भावार्थ:-हे माता! मुझे एक
ही दुःख विशेष रूप से हो रहा है, वह महाराज को अत्यन्त व्याकुल देखकर। इस
थोड़ी सी बात के लिए ही पिताजी को इतना भारी दुःख हो, हे
माता! मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होता॥3॥
* राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू॥
जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ॥4॥
जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ॥4॥
भावार्थ:-क्योंकि महाराज तो
बड़े ही धीर और गुणों के अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो
गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगंध है, माता! तुम
सच-सच कहो॥4॥
दोहा :
* सहज सकल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान॥42॥
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान॥42॥
भावार्थ:-रघुकुल में श्रेष्ठ
श्री रामचन्द्रजी के स्वभाव से ही सीधे वचनों को दुर्बुद्धि कैकेयी टेढ़ा
ही करके जान रही है, जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें
टेढ़ी चाल से ही चलती है॥42॥
चौपाई :
* रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई॥
सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मैं कछु जाना॥1॥
सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मैं कछु जाना॥1॥
भावार्थ:-रानी कैकेयी श्री
रामचन्द्रजी का रुख पाकर हर्षित हो गई और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली- तुम्हारी शपथ और भरत की सौगंध है, मुझे राजा के दुःख का दूसरा कुछ भी कारण विदित
नहीं है॥1॥
* तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता॥
राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥2॥
राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥2॥
भावार्थ:-हे तात! तुम अपराध
के योग्य नहीं हो (तुमसे माता-पिता का अपराध बन पड़े यह संभव नहीं)। तुम
तो माता-पिता और भाइयों को सुख देने वाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे
हो, सब सत्य है। तुम पिता-माता के वचनों (के पालन) में तत्पर हो॥2॥
*पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई॥
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे॥3॥
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे॥3॥
भावार्थ:-मैं तुम्हारी बलिहारी
जाती हूँ, तुम पिता को समझाकर वही बात कहो, जिससे चौथेपन (बुढ़ापे) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्य ने इनको तुम जैसे पुत्र दिए हैं, उसका निरादर
करना उचित नहीं॥3॥
* लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥
रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥4॥
रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥4॥
भावार्थ:-कैकेयी के बुरे मुख
में ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देश में गया आदिक तीर्थ! श्री रामचन्द्रजी
को माता कैकेयी के सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गंगाजी में जाकर (अच्छे-बुरे
सभी प्रकार के) जल शुभ, सुंदर हो जाते हैं॥4॥
श्री राम-दशरथ संवाद, अवधवासियों का विषाद, कैकेयी को समझाना
दोहा :
* गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह॥43॥
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह॥43॥
भावार्थ:-इतने में राजा की
मूर्छा दूर हुई, उन्होंने राम का स्मरण करके ('राम! राम!' कहकर) फिरकर करवट ली। मंत्री ने श्री रामचन्द्रजी का आना कहकर समयानुकूल विनती की॥43॥
चौपाई :
* अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे॥
सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे॥1॥
सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे॥1॥
भावार्थ:-जब राजा ने सुना
कि श्री रामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मंत्री
ने संभालकर राजा को बैठाया। राजा ने श्री रामचन्द्रजी को अपने चरणों में
पड़ते (प्रणाम करते) देखा॥1॥
* लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई॥
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥2॥
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥2॥
भावार्थ:-स्नेह से विकल राजा
ने रामजी को हृदय से लगा लिया। मानो साँप ने अपनी खोई हुई मणि फिर से पा
ली हो। राजा दशरथजी श्री रामजी को देखते ही रह गए। उनके नेत्रों से आँसुओं
की धारा बह चली॥2॥
* सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा॥
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं॥3॥
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं॥3॥
भावार्थ:-शोक के विशेष वश
होने के कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्री रामचन्द्रजी को हृदय
से लगाते हैं और मन में ब्रह्माजी को मनाते हैं कि जिससे श्री राघुनाथजी
वन को न जाएँ॥3॥
* सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी॥4॥
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी॥4॥
भावार्थ:-फिर महादेवजी का
स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं- हे सदाशिव! आप
मेरी विनती सुनिए। आप आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले)
और अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालने
वाले) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःख को दूर कीजिए॥4॥
दोहा :
* तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु॥44॥
बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु॥44॥
भावार्थ:-आप प्रेरक रूप से
सबके हृदय में हैं। आप श्री रामचन्द्र को ऐसी बुद्धि दीजिए, जिससे
वे मेरे वचन को त्यागकर और शील-स्नेह को छोड़कर घर ही में रह जाएँ॥44॥
चौपाई :
* अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ॥
सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥1॥
सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥1॥
भावार्थ:-जगत में चाहे अपयश
हो और सुयश नष्ट हो जाए। चाहे (नया पाप होने से) मैं
नरक में गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाए (पूर्व पुण्यों के फलस्वरूप मिलने वाला स्वर्ग चाहे मुझे
न मिले)। और भी सब प्रकार के दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्री
रामचन्द्र मेरी आँखों की ओट न हों॥1॥
* अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥2॥
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥2॥
भावार्थ:-राजा मन ही मन इस
प्रकार विचार कर रहे हैं,
बोलते नहीं। उनका मन पीपल के पत्ते की तरह डोल रहा
है। श्री रघुनाथजी ने पिता को प्रेम के वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता
फिर कुछ कहेगी (तो पिताजी को दुःख होगा)॥2॥
* देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥3॥
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥3॥
भावार्थ:-देश, काल
और अवसर के अनुकूल विचार कर विनीत वचन कहे- हे तात! मैं
कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्य को मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजिएगा॥3॥
* अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥4॥
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥4॥
भावार्थ:-इस अत्यन्त तुच्छ
बात के लिए आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसी ने पहले कहकर यह बात नहीं जनाई।
स्वामी (आप) को इस दशा में देखकर मैंने माता से पूछा। उनसे सारा प्रसंग
सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गए (मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई)॥4॥
दोहा :
* मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥45॥
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥45॥
भावार्थ:-हे पिताजी! इस मंगल
के समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिए और हृदय में प्रसन्न होकर मुझे
आज्ञा दीजिए। यह कहते हुए प्रभु श्री रामचन्द्रजी सर्वांग पुलकित हो गए॥45॥
चौपाई :
* धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥
चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥1॥
चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥1॥
भावार्थ:-(उन्होंने फिर
कहा-) इस पृथ्वीतल पर उसका जन्म
धन्य है, जिसके चरित्र सुनकर पिता को परम आनंद हो, जिसको
माता-पिता प्राणों के समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उसके
करतलगत (मुट्ठी में) रहते हैं॥1॥
* आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई॥
बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥2॥
बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥2॥
भावार्थ:-आपकी आज्ञा पालन
करके और जन्म का फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अतः
कृपया आज्ञा दीजिए। माता से विदा माँग आता हूँ। फिर आपके पैर लगकर (प्रणाम
करके) वन को चलूँगा॥2॥
* अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥3॥
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥3॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर तब श्री
रामचन्द्रजी वहाँ से चल दिए। राजा ने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत
ही तीखी (अप्रिय) बात नगर भर में इतनी जल्दी फैल गई, मानो डंक मारते ही
बिच्छू का विष सारे शरीर में चढ़ गया हो॥3॥
* सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥4॥
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥4॥
भावार्थ:-इस बात को सुनकर
सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गए जैसे दावानल (वन में आग लगी) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है, वह
वहीं सिर धुनने (पीटने) लगता है! बड़ा विषाद है, किसी को धीरज नहीं बँधता॥4॥
दोहा :
* मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ।
मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ॥46॥
मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ॥46॥
भावार्थ:-सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखों
से आँसू बहते हैं, शोक हृदय में नहीं समाता। मानो करुणा रस की सेना अवध पर डंका बजाकर उतर आई हो॥46॥
चौपाई :
* मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी॥
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥1॥
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥1॥
भावार्थ:-सब मेल मिल गए थे
(सब संयोग ठीक हो गए थे),
इतने में ही विधाता ने बात बिगाड़ दी! जहाँ-तहाँ लोग कैकेयी को गाली दे रहे हैं! इस पापिन को क्या सूझ पड़ा
जो इसने छाए घर पर आग रख दी॥1॥
* निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा॥
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥2॥
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥2॥
भावार्थ:-यह अपने हाथ से अपनी
आँखों को निकालकर (आँखों के बिना ही)
देखना चाहती है और अमृत फेंककर विष
चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंश रूपी
बाँस के वन के लिए अग्नि हो गई!॥2॥
* पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक
ठाटु धरि ठाटा॥
सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥3॥
सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥3॥
भावार्थ:-पत्ते पर बैठकर इसने
पेड़ को काट डाला। सुख में शोक का ठाट ठटकर रख दिया! श्री रामचन्द्रजी इसे
सदा प्राणों के समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता
ठानी॥3॥
* सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ॥
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥4॥
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥4॥
भावार्थ:-कवि सत्य ही कहते
हैं कि स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से पकड़ में न आने योग्य, अथाह
और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाए, पर
भाई! स्त्रियों की गति (चाल) नहीं जानी जाती॥4॥
दोहा :
* काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ॥47॥
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ॥47॥
भावार्थ:-आग क्या नहीं जला
सकती! समुद्र में क्या नहीं समा सकता! अबला कहाने वाली प्रबल
स्त्री (जाति) क्या नहीं कर सकती!
और जगत में काल किसको नहीं खाता!॥47॥
चौपाई :
* का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥1॥
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥1॥
भावार्थ:-विधाता ने क्या सुनाकर
क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते
हैं कि राजा ने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयी को विचारकर वर नहीं
दिया॥1॥
* जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥
एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥2॥
एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥2॥
भावार्थ:-जो हठ करके (कैकेयी
की बात को पूरा करने में अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखों के पात्र
हो गए। स्त्री के विशेष वश होने के कारण मानो उनका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो
धर्म की मर्यादा को जानते हैं और सयाने हैं, वे राजा को दोष नहीं
देते॥2॥
* सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥
एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥3॥
एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥3॥
भावार्थ:-वे शिबि, दधीचि और
हरिश्चन्द्र की कथा एक-दूसरे से बखानकर कहते हैं। कोई एक इसमें भरतजी की
सम्मति बताते हैं। कोई एक सुनकर उदासीन भाव से रह जाते हैं (कुछ
बोलते नहीं)॥3॥
* कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा॥
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥4॥
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥4॥
भावार्थ:-कोई हाथों से कान
मूँदकर और जीभ को दाँतों तले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी
बात कहने से तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जाएँगे। भरतजी को तो श्री रामचन्द्रजी प्राणों
के समान प्यारे हैं॥4॥
दोहा :
* चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥48॥
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥48॥
भावार्थ:-चन्द्रमा चाहे (शीतल
किरणों की जगह) आग की चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विष के समान
हो जाए, परन्तु भरतजी स्वप्न में भी कभी श्री रामचन्द्रजी के विरुद्ध कुछ
नहीं करेंगे॥48॥
चौपाई :
* एक बिधातहि दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥
खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥1॥
खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥1॥
भावार्थ:-कोई एक विधाता को
दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर भर में खलबली मच गई, सब
किसी को सोच हो गया। हृदय में दुःसह जलन हो गई, आनंद-उत्साह
मिट गया॥1॥
* बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकई केरी॥
लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताहीं॥2॥
लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताहीं॥2॥
भावार्थ:-ब्राह्मणों की स्त्रियाँ, कुल
की माननीय बड़ी-बूढ़ी और जो कैकेयी की परम प्रिय थीं, वे उसके शील
की सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाण के समान लगते हैं॥2॥
* भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥
करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥3॥
करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥3॥
भावार्थ:-(वे कहती हैं-) तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्री
रामचंद्र के समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं
हैं, इस बात को सारा जगत् जानता है। श्री रामचंद्रजी पर तो तुम स्वाभाविक
ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराध से उन्हें वन देती हो?॥3॥
* कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥
कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥4॥
कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥4॥
भावार्थ:-तुमने कभी सौतियाडाह
नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वास को जानता है। अब कौसल्या
ने तुम्हारा कौन सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगर पर वज्र
गिरा दिया॥4॥
दोहा :
* सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु करहिहहिं धाम।
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥49॥
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥49॥
भावार्थ:-क्या सीताजी अपने
पति (श्री रामचंद्रजी) का साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी श्री रामचंद्रजी के बिना घर रह सकेंगे? क्या
भरतजी श्री रामचंद्रजी के बिना अयोध्यापुरी का राज्य भोग सकेंगे? और
क्या राजा श्री रामचंद्रजी के बिना जीवित रह सकेंगे? (अर्थात्
न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे,
न भरतजी
राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे, सब उजाड़ हो जाएगा।)॥49॥
चौपाई :
* अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥
भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥1॥
भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥1॥
भावार्थ:-हृदय में ऐसा विचार
कर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलंक की कोठी मत बनो। भरत को अवश्य युवराजपद दो, पर
श्री रामचंद्रजी का वन में क्या काम है?॥1॥
* नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥2॥
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥2॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी
राज्य के भूखे नहीं हैं। वे धर्म की धुरी को धारण करने वाले और विषय
रस से रूखे हैं (अर्थात् उनमें विषयासक्ति है ही नहीं), इसलिए
तुम यह शंका न करो कि श्री रामजी वन न गए तो भरत के राज्य में विघ्न करेंगे, इतने पर
भी मन न माने तो) तुम राजा से दूसरा ऐसा (यह) वर ले लो कि श्री राम घर छोड़कर गुरु के घर रहें॥2॥
* जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥
जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई॥3॥
जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई॥3॥
भावार्थ:-जो तुम हमारे कहने
पर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो
उसे प्रकट में कहकर जना दो (कि मैंने दिल्लगी की है)॥3॥
* राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू॥
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥4॥
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥4॥
भावार्थ:-राम सरीखा पुत्र
क्या वन के योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और
वही उपाय करो जिस उपाय से इस शोक और कलंक का नाश हो॥4॥
छंद :
* जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।
हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥
जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।
तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिन समुझि धौं जियँ भामनी॥
हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥
जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।
तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिन समुझि धौं जियँ भामनी॥
भावार्थ:-जिस तरह (नगरभर का) शोक
और (तुम्हारा) कलंक मिटे, वही उपाय करके कुल की रक्षा कर। वन जाते हुए
श्री रामजी को हठ करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं- जैसे
सूर्य के बिना दिन, प्राण के बिना शरीर और चंद्रमा के बिना रात (निर्जीव
तथा शोभाहीन हो जाती है),
वैसे ही श्री रामचंद्रजी के बिना अयोध्या
हो जाएगी, हे भामिनी! तू अपने हृदय में इस बात को समझ (विचारकर देख) तो
सही।
सोरठा :
* सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।
तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥50॥
तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥50॥
भावार्थ:-इस प्रकार सखियों
ने ऐसी सीख दी जो सुनने में मीठी और परिणाम में हितकारी थी। पर कुटिला
कुबरी की सिखाई-पढ़ाई हुई कैकेयी ने इस पर जरा भी कान नहीं दिया॥50॥
चौपाई :
* उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥1॥
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥1॥
भावार्थ:-कैकेयी कोई उत्तर
नहीं देती, वह दुःसह क्रोध के मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती
है मानो भूखी बाघिन हरिनियों को देख रही हो। तब सखियों ने रोग को असाध्य
समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मंदबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं॥1॥
* राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥2॥
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥2॥
भावार्थ:-राज्य करते हुए इस
कैकेयी को दैव ने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा
कोई भी न करेगा! नगर के सब स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयी
को करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं॥2॥
* जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा॥
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥3॥
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥3॥
भावार्थ:-लोग विषम ज्वर (भयानक
दुःख की आग) से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्री
रामचंद्रजी के बिना जीने की कौन आशा है। महान् वियोग (की आशंका) से प्रजा
ऐसी व्याकुल हो गई है मानो पानी सूखने के समय जलचर जीवों का समुदाय व्याकुल
हो!॥3
Om Tat Sat
(Continued...)
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